गुरुवार 2 जुलाई 2026 - 08:10
मौलाना सय्यद सलमान नदवी हुसैनी की हक़ीक़त-बयानी उनकी विशेष पहचान: सय्यद अब्बास महदी हसनी

मौलाना सय्यद सलमान हुसैनी नदवी भारतीय उपमहाद्वीप के उन मुमताज़ उलेमा में शुमार होते हैं जिन्होंने अहले-बैत अतहार (अ) से मुहब्बत को न सिर्फ़ अपने दिल में बसाया बल्कि उसे अपनी फिक्र, तहरीर और ख़िताबात का केंद्र बनाया। वह दारुल उलूम नदवतुल उलेमा लखनऊ के उस्ताद और कई शैक्षणिक संस्थानों के बानी थे। उनकी शख्सियत अहले-बैत (अ) से दीवानगी भरी मुहब्बत और उनके दुश्मनों से खुली नफरत की एक अनोखी मिसाल है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार,  मौलाना सय्यद सलमान हुसैनी नदवी भारतीय उपमहाद्वीप के उन मुमताज़ उलेमा में शुमार होते हैं जिन्होंने अहले-बैत अतहार (अ) से मुहब्बत को न सिर्फ़ अपने दिल में बसाया बल्कि उसे अपनी फिक्र, तहरीर और ख़िताबात का केंद्र बनाया। वह दारुल उलूम नदवतुल उलेमा लखनऊ के उस्ताद और कई शैक्षणिक संस्थानों के बानी थे। उनकी शख्सियत अहले-बैत (अ) से दीवानगी भरी मुहब्बत और उनके दुश्मनों से खुली नफरत की एक अनोखी मिसाल है।


क़ुरआन-ए-मजीद में परवरदिगार-ए-आलम का इरशाद है: "कुल ला असअलुकुम अलैहि अजरन इल्लल मवद्दता फिल कुर्बा" (सूरह शूरा, आयत 23)

इस आयत के मुताबिक़, अहले-बैत (अ.) से मुहब्बत हर मुसलमान पर वाजिब और अज्रे रिसालत (मिशन की मज़दूरी) है। मौलाना नदवी ने अपनी पूरी ज़िंदगी इस उसूल को अमली जामा पहनाने में गुज़ार दी। वह अहले-बैत-ए-अतहार (अ) से गहरी मुहब्बत और अक़ीदत रखते थे और अपनी तक़रीरों में इसका बे-बाकी से इज़हार करते रहे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ऐसे तबक़े (वर्ग) में मुहब्बत-ए-अहले-बैत (अ) की शमा (चिराग़) जलाई, जहाँ नासिबियत (अहले-बैत से दुश्मनी) अपने पंजे गाड़ चुकी थी।

रसूलुल्लाह (स) का फरमान है: "मसलु अहले बैती फ़ीकुम कमसलि सफ़ीनेति नूहिन, मन रकिबहा नजा, व मन तखल्लफ़ अन्हा ग़रिक़" (अल-मुस्तदरक अलस-सहीहैन, अल-हाकिम)
अहले-बैत (अ) को निजात की कश्ती क़रार देते हुए नदवी साहब ने इसी को अपने अमल का हिस्सा बनाया।

मौलाना नदवी साहब का मौकिफ़ (रुख) सिर्फ़ मुहब्बत तक महदूद (सीमित) न था, बल्कि उन्होंने अहले-बैत (अ) के दुश्मनों से इज़हार-ए-बराअत (बेज़ारी) और नफरत को अपने ईमान का हिस्सा क़रार दिया।

इस सिलसिले में बहुत से तारीख़ी और नक़ली दलीलो (आयतें और रिवायातें) पेश किए।
मौलाना नदवी ने बे-बाकी के साथ उन किरदारों पर बात की जिन्होंने अहले-बैत (अ) के ख़िलाफ़ ज़्यादती की।
आपने ईरान के इस्लामी इंक़िलाब और आयतुल्लाह ख़ामनेई की हिमायत को अहले-बैत (अ) से मुहब्बत के अमली मुज़ाहिरों में क़रार दिया।
उन्होंने साफ़ किया:
"आज पूरी इस्लामी दुनिया आयतुल्लाह ख़ामनेई के पीछे खड़ी है, वह न सिर्फ़ ईरान के रहबर हैं बल्कि पूरी उम्मत के रहबर हैं।"
उन्होंने सियोनी लॉबी, इसराईली-ईसाई ज़हनियत, अमरीकी साम्राज्यवाद और अरब दुनिया के मुफ़्सिद (बिगाड़ पैदा करने वाले) अनासिर को अहले-बैत (अ.) और इस्लाम का साझा दुश्मन क़रार दिया।

मौलाना सलमान नदवी साहब ने बाज़ सहाबा विशेष रूप से अमीरे शाम मुआविया की तारीख़ी और रिवाई दलीलों के साथ आलोचना और निंदा की, जो उनकी हक़-बयानी और बे-बाकी का एक पुख़्ता सुबूत है।
इल्मी और तार्किक उसूल के मुताबिक़:
1. इख़्तिलाफ़-ए-राय (मतभेद) किसी आलिम की इल्मी हैसियत को ख़त्म नहीं करता।
2. अहले-बैत (अ) से मुहब्बत और उनके दुश्मनों से नफरत क़ुरआन व सुन्नत की आवश्यकता है।
3. मौलाना नदवी की तालीमी, लेखन और संकलित ख़िदमात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
उनके बारे में कहा जाता है कि उनकी तक़रीरों और तहरीरों में अहले-बैत (अ) का दिफ़ा (बचाव), दुश्मनान-ए-अहले-बैत की फटकार और फ़िलिस्तीनी मज़लूमों की हिमायत उनके ईमान का हिस्सा थी।
आपका यह मौकिफ़ महज़ जज़्बाती नहीं बल्कि इल्मी और तहक़ीक़ी था, जिसकी झलक उनकी बहुस सी किताबों और ख़ुत्बात में देखी जा सकती है।

मौलाना सय्यद सलमान नदवी (र) एक बे-बाक आलिम, मुहिब्ब-ए-अहले-बैत (अ) और दुश्मनान-ए-अहले-बैत से इज़हार-ए-नफरत करने वाले शख्स थे। उनका यह मौकिफ़ क़ुरआनी आयतों, नबवी हदीसों और तारीख़ी हक़ाइक़ पर मबनी (आधारित) था।
उनके विरोधियों ने इख़्तिलाफ़ किया, मगर इल्मी और मंतीक़ी उसूल यह है कि:
· अहले-बैत (अ) से मुहब्बत ईमान की बुनियाद और उनके दुश्मनों से नफरत ईमान का तक़ाज़ा है।
मौलाना नदवी की ज़िंदगी इस बात की अमली तफ़सीर है कि एक अहले-सुन्नत आलिम कैसे अहले-बैत (अ.) से मुहब्बत और उनके दुश्मनों से नफरत को अपने ईमान का हिस्सा बना सकता है। यह रास्ता मुश्किल ज़रूर है मगर क़ुरआन व सुन्नत की रौशनी में यही सिरात-ए-मुस्तक़ीम है।

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